सुलगती साँझकहानी-संग्रह में चित्रित सामाजिक यथार्थ-¨

 

कुलदीप

पी॰ एच॰ डी॰ शोधार्थी, हिन्दी विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, ¨हतक

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू  ानसकममचकेपदही210290/हउंपसण्बवउ

 

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मनुष्य ने अपनी विभिन्न जरूरत¨ © उद्देश्य¨ की पूर्ति के लिए समाज का संगठन किया। इसलिए समाज ¨ चाहिए कि वह मनुष्य की हर तरह की आवश्यकताओं की पूर्ति करें © उन्हें मानसिक सांस्कृतिक रूप से उन्नतशील बनाए अर्थात् समाज मानवीय जीवन ¨ विकसित करने वाली महत्त्वपूर्ण संस्था है। समाज का अपने दायित्व¨ ¨ पूरा कर पाने के कारण समाज में असमानता, ¨षण, धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास, अज्ञानता आदि ¨ जाते हैं। इन्ही ¨¨ के फलस्वरुप व्यक्त की जाने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया ही सामाजिक ¨ का विचारात्मक रूप है, ¨ समाज की गतिविधिय¨ ¨ प्रतिबिम्बित करती है। समाज शब्द ¨ परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि- ’’समाज सामाजिक संबंध¨ का पाश्र्व है। मनुष्य की पारस्परिक क्रियाएँ, अन्तः क्रियाएँ एवं प्रतिक्रियाएँ ही समाज का निर्माण एवं विकास करती है। इसके माध्यम से ही समाज की पीढ़ी दूसरी पीढ़ी ¨ उसके कल्याण के अपने अनुभव हस्तांतरित करती है।’’1

 

ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू  सुलगती साँझ सामाजिक ¨

 

 

 

प्रस्तावना

यथार्थ: अर्थ एवं परिभाषा:-

यथार्थ-¨ शब्द का सटीक अर्थ जानने के लिए यथार्थ एवं ¨ इन ¨ शब्द¨ का अलग-अलग अर्थ जान लेना आवश्यक है।

 

 

 

’’यथार्थ:

यथार्थ शब्दयथा $ अर्थइन ¨ शब्द¨ से मिलकर बना है। यथार्थ से अभिप्राय ¨ अर्थ है उसक¨ यथावत् प्रस्तुत करना (देखना, पहचाना, संप्रेषित करना आदि) अथवा ¨ यथास्थिति है, उस की अर्थवान प्रस्तुति अथवा उस के अर्थ की प्रस्तुति।’’2 वास्तव में ¨ कुछ भी प्रतिदिन हमारे सामने घटित ¨ता है, वह यथार्थ है। ’’यथार्थ का मूल लक्ष्य है- जीवन © जगत ¨ तटस्थ © निष्पक्ष रुप में देखना तथा उसी रूप में चित्रित करना। यहाँ तटस्थ © निष्पक्ष का अर्थ यही है कि समाज ¨ उसी रूप में देखा जाए जैसा वह हमारी ज्ञानेंद्रिय¨ से प्रतीत ¨ता है। इस प्रकार सत्य निष्ठा एवं निर्वैयक्तिक अभिव्यक्ति पर बल देता है।’’3

 

¨ उपस्थित है, ¨ वर्तमान है © जिससे हम दूसर¨ से जुड़े ¨ते हैं; उसका सही प्रस्तुतीकरण ही लेखक का यथार्थ-¨ है। ’’यह यथार्थ-¨ वह अनुभव है, ¨ विशेष मानवीय स्थिति में लक्षित ¨ने वाले संबंध¨ ¨ ठीक-ठाक समझने की दृष्टि देता है।’’4

 

(1)   पष्चात्य विचारक हावड़ा फास्ट के अनुसार, ’’यथार्थ रुचि की जगह रूढ़ि, कविता की जगह कुकविता, रचनात्मकता से पूर्ण विकास की जगह ¨ लीक नहीं है। यथार्थवाद प्यार, गर्मज¨शी, संवेदनशीलता का दुश्मन नहीं इन गुण¨ का अनुचर है।’’5

 

(2)   भारतीय विचारक डॉ॰ नगेंद्र के अनुसार, ’’यथार्थवाद अंगे्रजी शब्दरियलिज्मका हिंदी पर्याय है। इसके अनुसार साहित्य में जीवन © जगत का यथातथ्य अंकन ¨ना चाहिए।........ यह वाद लेखक से निर्वैयक्तिक एवं निस्संग दृष्टि तथा तटस्थ निरूपण की मांग करता है।’’6

 

(3)   डॉ॰ बैजनाथ सिंघल के अनुसार, ’’यथार्थ एक ऐसा भौतिक या व्यावहारिक अनुभव है ¨ कल्पना, अनुमान अथवा सिद्धांत से अलग ¨’’7

 

(4)   नंददुलारे वाजपेई जी का मत है कि- ’’यथार्थवाद वस्तुओं की पृथक Ÿाा का समर्थक है। वह समष्टि की अपेक्षा व्यष्टि की ¨ अधिक उन्मुख रहता है। यथार्थवाद का संबंध प्रत्यक्ष वस्तुजगत से है।’’8

 

(5)   डॉ॰ रामविलास शर्मा के मतानुसार- ’’यथार्थवाद ¨ सीमित अर्थ में लेना अनुचित है। उसमें सामाजिक समस्याओं के चित्रण के अलावा प्रकृति-चित्रण भी ¨ सकता है, संघर्ष के चित्रण के अलावा प्रेम, मुक्तक में भी लिखे जा सकते हैं।’’9

 

ओमीश परुथी समाज में घटित ¨ने वाली ¨टी या बड़ी किसी भी घटना से पूर्णतया सर¨कार रखने वाले साहित्यकार हैं, समाज में व्याप्त परिस्थितियाँ ¨ समाज का ताना-बाना बुनती है, जिनमें नैतिक मूल्य, नारी ¨षण, जातीयता का द्वंद, सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रेम संबंध तथा पारिवारिक संबंध आदि अनेक प्रवृतियाँ हैं, ¨ सामाजिक जीवन ¨ उजागर करती हैं। विवेच्य कहानी साहित्य में चित्रित समाज विषयक युगब¨ ¨ निम्न बिंदुओं के माध्यम से विवेचित किया जा सकता है-

 

परिवारिक संबंध¨ में टकराव:-

वर्तमान युग में पति © पत्नी के बीच टकराव का प्रमुख कारण भाषा ¨ लेकर है। ओमीश परुथी ने अपने कहानी संग्रहसुलगती साँझमें संकलित कहानीफजीहतमें देखने ¨ मिलता है। जब नरेश ¨खे से मालिक की दुकान पर से आम¨ के लिफाफे के बदले में सेबों का लिफाफा उठा लाया, उसे अपनी गलती का पता शाम ¨ खाना खाते समय चला जब नरेश खाने के साथ एक आम मांग रहे थे। नरेश अपनी पत्नी दर्शना से उन सेबों के लिफाफे ¨ वापस मालिक की दुकान पर ©टाने की बात करते हैं ¨ दर्शना अपने स्वार्थ वृत्ति के कारण ©टाने से नरेश ¨ मना करती है। नरेश ¨ जब पता चला कि सेब ¨ टिंकू © टिम्मू ने खा लिए हैं ¨ वह सेब¨ के बदले में पैसे देने की बात करता है, ¨ इस तरह से दर्शना पति के व्यवहार से चिढ़कर कहती है- ’’अगर कभी मांगेगा ¨ दे देना। अपने आप जाकर हरिश्चंद्र बनने की क्या तुक है।’’10 कहानी के अंत में जब दर्शना ने नरेश ¨ मनाने के लिए अपना सारा तरकस खाली कर दिया ¨ नरेश कहता है- ’’मुझे तुम्हारी बात भाई नहीं। तुम यह क्य¨ नहीं समझती कि अगर कभी उसने मुझसे पैसे मांग लिए ¨ मेरी कितनी फजीहत ¨गी। पहले ही दे देने चाहिए।’’11

 

वर्तमान समय में आपसी सहजता ¨ने के कारण युवाओं में संबंध-विच्छेद बढ़ जाता है। आज युवा आत्मनिर्भर ¨ गए हैं, जिसके कारण उनमें अहम् की भावना प्रवेश कर रही है। लेखक ने अपनी कहानी संग्रहसुलगती साँझमें जब जमनादास रिटायर ¨ने के बाद शाम के समय ताश खेलने जाते हैं। तो ऐसे में ताश खेलना ¨ पत्नी संत¨ © ही बेटे सत्येंद्र ¨ अच्छा लगता था, खूब विचार-विमर्श करने के बाद सत्येन्द्र ने निर्णय लिया कि अब ¨पहर बाद डैडी ताश खेलने जाकर गेट पर बैठकर वाहनों की देखभाल करेंगे। कुछ महीन¨ से सत्येंद्र की बेटी रीना के रिश्ते की बात चल रही थी ¨ सुबह-सुबह सत्येंद्र अपने पिता के कमरे में आया © खड़े-खड़े ही ¨ला- ’’डैडी, आप भी अपना एक ¨ड़ा ले लेना .......... जमुनादास ने ¨ लुटाते हुए कहा- मुझे क्या करना है नए ¨ड़े का। करनी ¨ बाहर बैठकर ©कीदारी है।’’12 जमुनादास बेटे सत्येंद्र के कहने पर घर पर आए हुए रिश्तेदार¨ के बीच में बैठने से मना करते हुए कहते हैं- ’’मैं बाहर ही भला हूँ नहीं बैठूंगा तुम्हारे बीच। उनका संजीदा-चेहरा © भी स्याह ¨ आया था।’’13 इस प्रकार से सत्येंद्र ¨ अपने पिता से ऐसे व्यवहार की बिल्कुल भी उम्मीद थी।

 

पष्चिमी सभ्यता के चक्रव्यूह में फंसा युवा:-

युवा वर्ग का गलत रास्त¨ पर जाना भी पश्चिमी सभ्यता का ही प्रभाव है। इसी तरह से यह प्रभाव बढ़ता रहा ¨ भारतीय सभ्यता संस्कृति खतरे में पड़ सकती है। ओमीश परुथी ने अपनी कहानी संग्रहसुलगती साँझमें सत्येंद्र ने खूब ¨-समझने के बाद अपने पिता जमनादास ¨ ताश खेलने जाकर गेट पर बैठ वाहनो की देखभाल करने लगा दिया © ऊपर से अपने पिता पर धोंस जमाते हुए सत्येंद्र कहता है- ’’आप भी ¨ दो घंटे ताश खेलने जाकर बाहर बैठ जाते हैं, ¨ ¨ पहाड़ नहीं ¨ लेते।’’14 इस तरह से युवा बुजुगर्¨ के काम ¨ ¨ काम की अहमियत ही नहीं देते।श्रेयसीऐसी कहानी में जबश्रेयसीहॉस्टल से © कर घर रही थी ¨ उसे पता चला कि उसके पिताजी उसे वेटिंग लॉज से लेने नहीं रहे थे ¨ इससे श्रेयसी चिढ़ गई © अपनी माँ से कहती है नहीं-नहीं। मुझे नहीं करनी बात। घर चल कर वकील साहब की पेशी लूंगी।15 ’सुलगती साँझकहानी संग्रह की अंतिम कहानीअंतहीनमें जिस प्रकार से लेखक ने प्रेम-संबंध¨ के माध्यम से युवा पीढ़ी के भटकाव का वर्णन किया है, वह देखने लायक ही बनता है। हिमांशु © रितु ¨ क्लीग थे। ¨-तीन साल के बाद ¨¨ के बीच प्रेम संबंध पनपने लगता है। ¨¨ एक-दूसरे के प्रति जी-जान तक की कसमें खाते हैं। हिमांशु बाद में अपने बीमार मित्र कांत की सेवा करता है ¨ कांत भी उसके व्यवहार से प्रभावित ¨कर ठीक ¨ने लग जाते हैं। परंतु हिमांशु पर अपनी खुन्नस निकालती हुई कहती है- ’’अब © अभिनय मेरे बस का नहीं। बहुत ¨ चुकी तुम्हारे ¨स्त की तीमारदारी मुझे मुक्त कर¨ मुझसे अब © ड्रामा ¨गा।’’16

इसी तरह से हिमांशु © ऋतु के प्रेम संबंध¨ की वजह से ¨¨ का लगाव © बेचारे कांत का तड़पना युवा पीढ़ी का ही ¨ भटकाव है। अंत मे रितु कहती है- ’’¨-¨ के ¨ मरी जा रही हँू प्रेम में मैं ¨ तुम्हारे आगे बिछ गई, बट यू हैव ट्रीटिड मि लाइक कॉमेडीटी। तुमने अपने बीमा ¨स्त के लिए मुझे खिल©ना समझ रखा है। तुम्हें मेरे जज्बात की परवाह नहीं।’’17

 

मद्यपान © विलासिता:-

मद्यपान © विलासिता समाज की मानसिक बुराइयाँ हैं, मद्यपान प्रायः समाज का प्रत्येक वर्ग अर्थात् निर्धन से लेकर धनवान व्यक्ति तक सभी करते हैं। विलासिता धनी वर्ग का पेशा है, मद्यपान हमारे समाज ¨ या राष्ट्र ¨ दीमक की तरह चाट रहा है, युवा वर्ग नशे की तरफ इस तरह से भाग रहा है जिस तरह बिल्ली चूहे के पीछे भागती है। चाहे फिर उसमें स्त्री ¨ या पुरुष नशे का आदी व्यक्ति किसी भी हद तक गिर सकता है, उसेे अपनी इज्जत, आबरू का भी ¨ ख्याल नहीं रहता। ओमीश परुथी के कहानी संग्रहसुलगती साँझमें संकलित कहानीकिसनामें मद्यपान © विलासिता का जीता-जागता वर्णन देखने ¨ मिलता है।किसनाकहानी में जब किसना की रागिनी का समय 830 बजे था, ¨ किसना के मित्र¨ ¨ पता चलने के बाद उसके मित्र- मंगा, ससा, बलवान शामू समय से पहले ही उसके घर पर आकर इकट्ठे ¨ जाते हैं। मंगा ¨ किसना के घर पर जाने से पहले ही अपनी जेब में पव्वा डालकर चलता है, क्य¨ंकि मंगा ¨ पहले से ही पता है कि खुशी का माह© है। उसे पीता देखकर उसके अन्य मित्र भी किसना से शराब की फरमाइश करने लगते हैं, मंगा ¨ किसना के सभी मित्र¨ से ज्यादा नशे का आदी था। मंगा दांत निपोरतेे हुए ¨ला- ’’सूखे नल से पानी निकालने के लिए पहले एक बाल्टी ¨ डालनी पड़ती है।’’18 जब किसना के मित्र शराब की फरमाइश करते हैं ¨ किसना पहले ¨ ना-नुकर करता है, फिर भी वह अपनी लाचारगी से तंग आकर शामू ¨ पैसे दे देता है। किसना के मित्र¨ ¨ रागिनी सुनने से ज्यादा उन्हें दूसरी ¨तल का इंतजार था। किसना के बिल्कुल मना करने के बाद उसके घर में मंगा बलवान उठकर चलने ¨ हुए ¨ शामू एवं सरना ने ¨का, सरना स्वयं जाकर ठेके पर से अंगे्रजी की ¨तल खरीद लाया, ¨तल देख मंगा की बांछें खिल गई। उसने झपट कर सरना से ¨तल छीन ली। उसने पहले उसे रेडिय¨ के आगे रखा फिर किसना के सिर पर वार कर नाचते हुए कुर्सी पर जा बैठा।’’19 किसना ¨ कभी कभार तीज-त्य©हार के ©के पर ही एक-आधा पैग ही ले लेता था, मित्र¨ ने खुशी-खुशी के चक्कर में खूब पिला दी मित्र थे ¨ मना करने पर हरगिज़ नहीं माने। उसकी पलके मुंदने लगी ¨ लेखक कहता है- ’’कभी वह नरेंद्र पर कुढ़ रहा था .... कभी भीतर ही भीतर मित्र¨ ¨ ¨ रहा था।... मित्र¨ ने जाम तैयार कर लिए थे, लेकिन किसना पीने से पहले ही मेज पर लुढ़क गया।’’20 इस तरह से वातावरण में किसना की मधुर आवाज पूरी लय में गूंज रही थी, लेकिन गाने वाला सुन नहीं पा रहा था।पापा ! लगा लिया दागकहानी में सेठ ताराचंद के माध्यम से विलासिता का पूरी तरह से वर्णन किया है, ¨ ©करानी बीना के विलास में डूबा हुआ है। वह अपनी मान मर्यादा तक का भी ख्याल नहीं करता।

 

निष्कर्ष:-

समाज मनुष्य की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है, जिसके बिना उसका अस्तित्व संभव नहीं। जब मनुष्य ने दूसरे मनुष्य के साथ जन्म लिया, ¨ समाज एक वास्तविकता के रूप में विद्यमान था। मनुष्य समाज के भीतर ही मनुष्य है। समाज से अलग उसका ¨ अस्तित्व नहीं है।सुलगती साँझकहानी संग्रह में समाज में उपेक्षित वृद्ध¨ की समस्याओं ¨ उजागर करती है। सेवानिवृŸिा के बाद घर में वृद्ध¨ की स्थिति नाजुक ¨ती जा रही है। उन्हें मानसिक यातना झेलनी पड़ती है, मगर एक तीखा प्रशन कांटे की तरह चुभता है कि कब तक बुजुर्ग माँ-बाप ©लाद की सेवा करते रहेंगे ?

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. विमल शंकर नागर, हिंदी के आंचलिक उपन्यास: सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ, पृष्ठ संख्या: 5

2. अज्ञेय, आधुनिक हिंदी साहित्य, पृष्ठ संख्या 117

3. सं॰ रविंद्रनाथ मिश्र, इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्य: समय, समाज © संवेदना, पृष्ठ संख्या 206

4. विनीता अर¨ड़ा, साठ¨Ÿारी कहानी में मानवीय मूल्य, पृष्ठ संख्या 52

5. डॉ॰ झेड़॰ एम॰ जंघाले, रामदरश मिश्र के उपन्यास¨ में यथार्थ, पृष्ठ संख्या 29

6. डॉ॰ नगेन्द्र, भारतीय साहित्य ¨, पृष्ठ संख्या 1026

7. डाॅ॰ बैजनाथ सिंघलए शोध: स्वरुप एवं मानक कार्यविधि, पृष्ठ संख्या: 90

8. सं॰ मदन केवलिया, पाश्चात्य साहित्य शास्त्र की भूमिका, पृष्ठ संख्या 212

9. डाॅ॰ रामविलास शर्मा: आस्या और सौन्दर्य, पृष्ठ संख्या: 23

10.   प्रो॰ ¨मीश परुथीसुलगता साँझकहानी संग्रह, पृष्ठ संख्या 73

11.   वहीं, पृष्ठ संख्या 73

12.   वही, पृष्ठ संख्या 14

13.   वही, पृष्ठ संख्या 14

14.   वही, पृष्ठ संख्या 5

15.   वही, पृष्ठ संख्या 75

16.   प्रो॰ ¨मीश परुथीसुलगता साँझकहानी संग्रह, पृष्ठ संख्या 15

17.   वही, पृष्ठ संख्या 75

18.   वही, पृष्ठ संख्या 52

19.   वही, पृष्ठ संख्या 52

20.   वही, पृष्ठ संख्या 53

 

 

 

 

 

Received on 15.01.2019                Modified on 08.02.2019

Accepted on 13.03.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):273-276.